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स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण कि वह 14 प्रमुख बातें जो आपको जाननी चाहिए

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 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के इस मौके पर लगातार 7वीं बार देश को संबोधित किया. पीएम मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करते हुए की. पीएम मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करते हुए की. उन्होंने कोरोना वॉरियर्स को नमन करते हुए कहा कि इस कोरोना के काल में कई परिवार प्रभावित हुए हैं. अपने भाषण में उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर, कोरोना संकट और आत्मनिर्भर भारत तक का आह्वान किया. इससे पहले उन्होंने राजघाट जाकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धाजंलि अर्पित की, अपने सरकारी आवास से निकलने के बाद वह सीधे राजघाट पहुंचे और बापू की समाधि पर श्रद्धासुमन अर्पित किए. बता दें कि Covid-19 महामारी के साये में लाल किले पर आयोजित होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोहों के लिए चार हजार से अधिक लोगों को आमंत्रित किया गया था जिनमें अधिकारी, राजनयिक और मीडियाकर्मी शामिल थे. इसके मद्देनजर सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे.  1- पीएम मोदी ने कहा, कोरोना के इस असाधारण समय में, स...

क्या केंद्र सरकार वाकई एरोगेंट है?

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पिछले दिनों नगा विद्रोही नेताओं के साथ केंद्र सरकार के शांति समझौते पर आक्रामक रुख अपनाते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र सरकार को एरोगेंट कहा। हिन्दी में एरोगेंट के अर्थ होते हैं- अक्खड, हठी, अभिमानी, हेकड़। जाहिर है लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में ऐेसे शब्दों के लिए कोई जगह हो ही नहीं सकती। यदि ऐसा होने का आरोप किसी सरकार पर लगता है तो उस सरकार को अपने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पण के स्तर पर विचार करना चाहिए। यह निश्चित ही गंभीर मामला है। यह बात तब और भी गंभीर हो जाती है जब हाल ही में लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता देश में आपातकाल की संभावनाओं पर टिप्पणी कर चुके हों। सोनिया गांधी की आपत्ति शांति समझौते को लेकर कदापि नहीं है बल्कि इस समझौते के बारे में असम, मणिपुर और अरुणांचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को अंधेरे में रखने से है। समस्या से प्रभावित इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को निश्चित ही विश्वास में लिया जाना चाहिए था। नरेंद्र मोदी सरकार कहती भी रही है कि वह लोकतंत्र के स्वस्थ मूल्यों को लेकर चलेगी और किसी राज्य में यदि दूसरे दल की भी सरकार है तो वहां के मुख्यमंत्रियों क...

भाजपा और कांग्रेस में बढ़ती दूरियां

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भारत के वर्तमान राजनीतिक हालातों में फिलहाल यही समझ आ रहा है कि केंद्र में या तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार बनेगी या भाजपा के। लेकिन ये दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां देश में जिस राजनीतिक विघटन की नींव रखती नजर आ रही हैं वह किसी के हित में नहीं है। दोनों ही पार्टियां एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगी हैं वह राजनीतिक विश्लेषकों को भी चिंता में डालने वाला है। ऐसा नहीं है कि यह देश स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति और परंपराओं का साक्षी नहीं रहा है। लेकिन यूपीए सरकार के कार्यकाल और अब एनडीए सरकार के समय जिस प्रकार देश की सर्वोच्च पंचायत, राजनीतिक पार्टियों की मनमानी का शिकार हो रही है वह चिंता में डालने वाला घटनाक्रम है। यूपीए सरकार के समय संसदीय सत्रों को जिस प्रकार भाजपा बाधित करती थी लगभग उसी रास्ते पर अब कांग्रेस भी चल रही है। उलटबांसियों के इस खेल को देश का नागरिक बड़ी लाचारी और हताशा के साथ देख रहा है और राजनीति में पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ती दूरियां और पनपती अस्वीकार्यता के कारणों को जानने का प्रयास कर रहा है। इन दूरियों के अपने खतरे हैं। इन खतरों के परिणाम बहुत गहरे हैं। लोकतांत...

आईटीआई का महत्व

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह बयान की देश को आईआईटी नहीं बल्कि आईटीआई की जरूरत है, धरातलीय परिस्थितियों के मद्देनजर काफी महत्वपूर्ण है। उपेक्षा और भ्रष्टाचार का शिकार हो रहे आईटीआई के तंत्र को विशेष महत्व का क्षेत्र बनाने में प्रधानमंत्री का यह बयान मील का पत्थर साबित होगा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। आर्थिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि देश के आर्थिक विकास के लक्ष्यों को तेजी से हांसिल करने के लिए नए रोजगार पैदा करना एक बड़ी चुनौती है। देश में युवाओं की संख्या को देखते हुए सभी को बड़े पदों पर समायोजित करना असंभव ही है। अतः इंजीनियरों की अपेक्षा कुशल और दक्ष श्रम शक्ति तो आईटीआई से ही मिल सकती है। वैसे भी एक इंजीनियर के साथ दस-बीस आईटीआई प्रशिक्षितों की आवश्यकता रहती है। लेकिन पिछले दो दशकों से निजि क्षेत्र के इंजीनियरिंग काॅलेजों से जिस प्रकार से इंजीनियरों की बड़ी संख्या निकली है, लेकिन गुणवत्ता के लिहाज से बाजार में उन्हें नौकरी के लायक ही नहीं समझा जा रहा। अतः आईटीआई के मामले में यह सतर्कता बड़ी कड़ाई के साथ बरतनी होगी कि वहां गुणवत्ता के मामले में समझौता न हो, तभी बात बन सकेगी। दूसरी...