'गंदी बात' के विरोध में जावेद
"गंदी बात" के विरोध में जावेद वर्तमान दौर के फिल्मी गीतों में लगातार बढ़ रहे भद्देपन से देश के साहित्य जगत की चिंतायें अब गीतकार जावेद अख्तर के माध्यम से मुखर हुई हैं। उन्होंने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज को भद्दे फिल्मी गीतों के विरुद्ध अपनी आवाज उठानी चाहिए। जावेद की इस पहल का स्वागत हर स्तर पर होना चाहिए। किसी भी गीत और साहित्य की रचना केवल मनोरंजन हेतु नहीं अपितु समाज को अनुशासित करने, उसे सभ्य और सुसंस्कारित बनाने के लिए होती है। इसीलिए साहित्य समाज का दर्पण कहलाता है जो किसी भी इंसान को गहरे तक प्रभावित करने की अनूठी ताकत रखता है। सामान्य मनोरंजन के लिए लिखे गए गीत भी अपना गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। ’चोली के पीछे...’ से लेकर ’गंदी बात...’ और उसके आगे तक के फिल्मी गीतों ने समाज का मनोरंजन कम किया, अराजकता अधिक फैलाई। ऐसे गीतों के सामाजिक प्रभाव को देखें तो पाते हैं कि इसने ’गंदी बात’ की गंभीरता को समाप्त किया, जिसके परिणाम स्वरूप अनेक असामाजिक घटनाएं तब तक गंदी बात नहीं रह गईं जब तक उनको अंजाम देने वाले कानूनी शिकंजे में नहीं फंसे। युव...