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महाराणा प्रताप के सामने 36000 मुगल सैनिकों ने किया था आत्मसमर्पण

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क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ... इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूँकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं. इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पाँच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है. क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना.. महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सीमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध, महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर आधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं. हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे.. और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भ...

"हिन्दू" इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानते - सर वीएस नायपाल

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भारतीय हिन्दुओं पर सर वी. एस. नॉयपाल की टिप्पणी सटीक थी। लगभग तीन दशक पहले उन्होंने कहा था, 'भारत में यह सचमुच बड़ी समस्या है। हिन्दू लोग इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानते।' फिर नासमझी से लैस कुछ का कुछ बोलते, करते रहते हैं। ऐसी गतिविधियों को निष्फल रहना ही है। उदाहरणार्थ, क्या हिन्दुओं ने इस पर सोचा है कि भारत में मुस्लिम नेता सेक्युलरिज्म को नारा बनाते हैं, जबकि इंग्लैंड में सेक्युलरिज्म को ही चुनौती देते हैं! यह सामान्य तथ्य है कि मुस्लिम लोग सेक्युलरिज्म को इस्लाम-विरोधी मानते हैं। अत: वे सेक्युलर नहीं हैं, न होना चाहते हैं, परन्तु हिन्दू नेताओं की इसलिए निन्दा करते रहते हैं कि वे पर्याप्त सेक्युलर नहीं! प्रो. मुशीर-उल-हक ने अपनी पुस्तक 'पंथनिरपेक्ष भारत में इस्लाम' (इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज, शिमला, 1977) में नोट किया था कि यहां सेक्युलरवादियों के पास मुसलमानों को सेक्युलर दिशा में प्रवृत्त करने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं है। वह स्थिति आज भी नहीं बदली है। मुसलमानों, और विशेषकर इस्लाम के बारे में हिन्दू बुद्धिजीवियों, नेताओं में अज्ञान और अहं...

भारत की सामूहिक चेतना की सूत्रधार है हिन्दी

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पिछले दिनों 10वां विश्व हिन्दी सम्मेलन भोपाल में संपन्न हुआ। तीन दिन में कुल बारह विभिन्न विषयों पर देश के वरिष्ठ हिंदी सेवियों ने हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिए चिंतन किया। इस चिंतन-मंथन से जो मक्खन निकला वह निश्चित ही देश-विदेश में हिन्दी के व्यावहारिक विस्तार में सहायक तो होगा ही साथ ही हिन्दी का मान-सम्मान बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगा। हिन्दी जगत इस बात से किसी हद तक संतुष्ट हो सकता है कि कुछ वर्ष पहले तक हिन्दी के प्रति देखा जाने वाला उपेक्षाभाव अब कहीं तिरोहित हो चला है। पिछले कुछ समय से हिन्दी के प्रति जो स्वीकार्यता देखी जा रही है वह निष्चित ही संतोष देने वाली है लेकिन अभी हिन्दी को बड़ा रास्ता तय करना है। दरअसल हिन्दी जगत को हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए बड़े और वास्तविक जोखिम उठाने होंगे। जिस प्रकार हिन्दी प्रेमी युवा अब अपने काम-काज की राहें अंग्रेजी भाषा के स्थान पर हिन्दी भाषा में तलाशनें का जोखिम उठाने लगे हैं और सफलता भी प्राप्त करने लगे हैं, इस बदलती मानसिकता ने हिन्दी को काफी आगे बढ़ाया है। अंग्रेजी भाषियों के सामने ही उन्हीं के स्तर पर खड़े होकर बिना किसी हिचक या मानस...